वो अच्छे थे, बहुत अच्छे। उनमें बहुत अच्छाइयाँ थी जो स्वभावतः थी। कोईं दिखावा नही, कोईं छल नहीं। जो है वो स्वाभाविक है।
मुझे लगता है मैं उनका प्रतिबिंब हूँ। पर प्रतिबिम्ब असल नहीं होता, उसमे सत्व नहीं होता, वो आवरण दिखता है। वैसे भी मुझे स्वयं स्वाभाविक तौर पर उन जैसा नहीं बनना, न हीं कोशिश करना है पर मैं चाहता हूँ, मुझे कोईं और वैसा मिले।
मैं दुखी हूँ कि मेरे आसपास मेरे जानने वाले वैसे नहीं हैं, और मैं स्वयं भी वैसा नहीं जिससे मेरे आसपास वाले खुश हों प्रभावित हों, लेकिन मैं फिर भी यही आशा करता हूँ कि कोईं अच्छा बने अच्छा मिले। हो सकता है और लोग भी यही आस लगाए बैठें हों, कुछ ने तो यही आस मुझसे ही लगाई हो।
मेरी ये तलाश कभी-कभी बेमानी सी लगती है, एक झूँठ जो कि मैंने अपने मन में बसा रखा है। हर तरफ लोग हैं जो उलझे हुए हैं अपनी रोज़ मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने में। वो भाग रहे हैं, परेशान हैं, फिर भी लगे हुए हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि वो इस सब में परेशान हैं या वो ये सब तब भी कर रहे हैं जब कि उनकी अंतरात्मा इस सबसे खुश नहीं है। वो कुछ और करना चाहती है पर ये लोग, हम लोग, मैं भी एक दबाव में है। दौड़ना मजबूरी सा हो गया है बिना लक्ष्य के।
कोईं ऐसा चाहिए जिस पर आवरण न हो, जिसकी देह उसकी अंतरात्मा का ही रूप हो, पूर्णतया सत्य, शांत और निर्मल। जो अपना जीवन अपने दिल से जी रहा हो, उसे पता हो कि वो क्यों और क्या कर रहा है। कोईं ऐसा जो सबसे प्रेम कर सके, प्रेम भी ऐसा जो बंधन में न रखे, उन्मुक्त छोड़ दे खुद को और दूसरों को भी।
ये कठिन है दुर्लभ है परंतु असम्भव नहीं। पता नहीं ये तलाश कब पूरी होगी।