रविवार, 16 अगस्त 2020

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ - स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेयी (Late Shri Atal Bihari Vajpayee Ji)

आज हमारे देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि है, मैं उन्हें शत शत नमन करता हूँ।
वो आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी अमिट छबि सदैव हमारे मन मस्तिष्क में बनी रहेगी, उनके जैसे बिरले व्यक्ति जीवन में देखने को नहीं मिलते।
मैं उनके बारे में इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि वो प्रधानमंत्री थे या भारत रत्न से सम्मानित हैं, मैं इसलिए उनके लिए लिख रहा हूँ क्योंकि उनसे मुझे प्रेरणा मिलती है, उनके जीवन का मेरे जीवन पर अद्भुत प्रभाव रहा है। 

मैं बचपन से सोचता था की मेरा जन्म आज़ादी के समय क्यों नहीं हुआ जब बहुत सारे महापुरुषों ने इस धरती पर बड़े बड़े कार्यों को सम्पादित किया था ताकि मैं भी उन्हें देख पाता, चाहे फिर वो सुभाष चंद्र बोस हों, महात्मा गाँधी हों, शास्त्री जी, लोकमान्य तिलक जी या और भी महान लोग जिन्होंने कठिन परिस्थिति में ऐसे कार्यों को किया जो असंभव से लगते हैं।
मेरा मानना था की महापुरुष पहले हुआ करते थे अब नहीं, लेकिन अटल जी को देखने के बाद मेरा यह भ्रम दूर हुआ। उनको सुनने की लालसा सदैव रहती है। एक सरल और मृदु भाषी व्यक्ति जिन्हें सुनने के लिए सदैव सब लोग तैयार रहा करते थे।
१५ अगस्त का उनका भाषण सुनने के लिए सुबह से टीवी के सामने बैठ जाया करते थे। उनकी कवितायें आज भी नयी सी लगती हैं।
उनका जीवन दर्शन उनकी कविताओं से झलकता है उनकी कविताओं में देश भक्ति की भावना, संघर्ष से सदैव लड़ने की चेष्टा दिखाई देती हैं।

उनकी एक कविता की पंक्तियों में जिस तरह उन्होंने भारत भूमि के लिए लिखा है वो अमर बन गया है 

यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

उनकी कविताओं से ऐसा परिलक्षित होता है, जैसे उनका मन सदैव भारत भूमि के लिए विमर्शरत रहता हो।
उनकी इन पंक्तियों में यह भाव साफ़ देखा जा सकता है :

"जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध,
काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।"

 और देश की सम्प्रभुता को लेकर इस तरह के दृढ निश्चय को उनकी पंक्तियों में देखा जा सकता है की हर तरह के  कठिन संघर्ष के समय भी वह खुद को सकारात्मक रखते थे

"दिन दूर नहीं खंडित भारत को, पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक,  आज़ादी पर्व मनाएँगे॥"

इन पंक्तियों में भी उनकी संघर्ष गाथा और सकारात्मक दृष्टि दिखती है -
"हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ"

और उनकी एक प्रसिद्द कविता जनमानस को आज भी प्रेरणा देती है -

"आओ फिर से दिया जलाएँ, भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा, अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ, आओ फिर से दिया जलाए।

वो देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करके हर तरह बलिदान देकर के लड़ने को तत्पर हैं लेकिन झुकने को तैयार नहीं -

दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

दुश्मन को सीधे आँख दिखाकर बोलने वाला प्रधानमंत्री हमारे देश ने पहली बार देखा था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे एक आम आदमी की तरह ही रहे। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना करते हुवे लिखा था की-

"मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ, 
इतनी रुखाई कभी मत देना।"

परम श्रद्धेय अटल जी के हृदय में देश के लिए अपना बलिदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था।  वे अपनी कविताओं में उन्हें याद करते थे और आज की पीढ़ी से भी बलिदान की अपेक्षा करते थे -

"बलिदानों की बेला आई, लोकतंत्र दे रहा दुहाई,
स्वाभिमान से वही जियेगा, जिससे कीमत गई चुकाई। "

मेरी समझ से अटल जी हमारे देश के पहले ऐसे राजनेता या प्रधानमंत्री रहे हैं, जो अपना धर्म खुलकर स्वीकारते 
थे। धर्मनिरपेक्ष होने के साथ साथ वह गर्व से कहते थे मैं हिन्दू हूँ। धर्मनिरपेक्षता का झूठा दिखावा नहीं किया 
लेकिन कार्य उन्होंने सभी धर्मों के लिए बराबर किया-

"मैं तो समाज की थाती हूं, मैं तो समाज का हूं सेवक।
मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय। "

कितनी भी मुश्किलों का सामना हो अटल जी पुरे निश्चय के साथ उनका डंटकर मुकाबला करते थे उन्होंने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में ही गुजरात भूकंप, गोधरा काण्ड, बाढ़, कारगिल युद्ध और न जाने कितनी कठिनाईयां देखी लेकिन फिर भी देश को मायूस न किया।
उनका मानना था की यदि हम मिलकर लड़ें तो हर तरह की जीत संभव है फिर कितनी ही मुश्किलें क्यों न हों -

"बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।"

अटल जी का जीवन हमारे मन मस्तिष्क पर एक अद्भुत प्रभाव छोड़ता है।  आज भी उन्हें सुनने को मन तरसता है उनके वीडियो यू ट्यूब पर आज भी बड़ी मात्रा में देखे जाते हैं।
मैं धन्य हूँ की मेरे जीवनकाल में एक ऐसे महापुरुष भी रहे, अटल जी को उनकी द्वितीय पुण्यतिथि पर शत शत नमन। 


सोमवार, 10 अगस्त 2020

चीनी उद्पादों का बहिष्कार (Boycott Chinese products)

                                 इस समय लगभग पुरे देश में चीन विरोधी माहौल बना हुआ है। हमारा देश ही क्या कोरोना महामारी फैलने के बाद तो विश्व के कई देश खुलकर चीन के खिलाफ बोल रहे है। भारत में चीन का विरोध होने के बहुत सारे कारण है, और सबसे बड़ा कारण है राष्ट्र सुरक्षा।

पिछले कई सालों से भारत ने अनुभव किया है की आतंकवाद रोकने के मामले में चीन भारत का समर्थन नहीं करता, चीन का समर्थन करना या विरोध करना उसका अपना आतंरिक मामला है परन्तु उसके गलत निर्णयों की वजह से भारत से आतंकवाद ख़त्म करने में कठिनाइयां आती हैं।  गलवान घाटी वाला मामला अभी ताज़ा ही है जहाँ हमारे जवानों की शहादत चीन की विस्तारवादी सोंच की वजह से हुई।  

यहाँ बात सिर्फ चीन के भारतीय सीमाओं पर कब्ज़ा करने की नहीं है।  चीन भारतीय बाज़ार पर शुरू से ही पूरी तरह कब्ज़ा कर भारतीय बाज़ार को पूरी तरह हथियाना चाहता है और बहुत सारे सेक्टर्स में वह सफल भी हुआ है। 

चीन ने पिछले वर्ष भारत में लगभग ४०० बिलियन डॉलर का निर्यात किया जो की हमारे निर्यात से बहुत ज़्यादा है। चीन की व्यापर नीति के मुताबिक वह भारत के बहुत से सेक्टर्स में सुनियोजित तरीके से निवेश करता है और भारत में बहुत काम कीमत में अपने माल को बेचने के बाद भारतीय मूल के उद्योगों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाता है। 

कईं बार देखा गया है की चीन से सस्ते माल के आयात की वजह से भारत के कईं उद्योगों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है और कइयों को तो बंद ही करना पड़ा है। 

इसका सबसे बड़ा उदहारण है खिलौना उद्योग, जबसे भारत में चीनी खिलौनों ने पैर पसारना शुरू किया है भारत के कईं सारे खिलौना उद्योगों को बंद होना पड़ा है और उनसे जुड़े रोज़गारों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। 

ऐसा ही एक उदाहरण है सोर ऊर्जा सेक्टर (सोलर एनर्जी) जिसमें भारत ने बहुत प्रगति की लेकिन चीन से सस्ते सोलर पेनल के आयात की वजह से भारत उतने रोज़गार पैदा नहीं कर पाया जितने उसने सोचा था और तो और आयात की वजह से रिसर्च पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। 

जब हम कोई प्रोडक्ट खुद बनाते हैं तो उसपर लगातार रिसर्च करते हैं की कैसे उसे और उपयोगी, कुशल और सस्ता बना सकें लेकिन जब वही चीज़ हम काम कीमत में आयात करते हैं तो उसपर रिसर्च लगभग बंद हो जाती है। इसलिए विज्ञानं के क्षेत्र में बहुत नुकसान होता है इस तरह के आयात के कारण। 

ये दो सिर्फ बहुत छोटे उदहारण हैं , चीन ने लगभग हर सेक्टर पर आज अपना कब्ज़ा किया हुआ है।  चीन के सस्ते मोबाइल की वजह से भारत में बड़े उद्योगपति यहाँ मोबाइल कंपनी डालने तक में डरते हैं, ऐसा ही हाल टेलीविज़न बनाने वालों का हुआ।  चीन का एल ई डी मार्केट इतना सक्षम है की भारतीय टेलीविज़न और डेकोरेशन वाले उद्योगपति उसके सामने बुरी तरह लड़खड़ा गए। 

कैसे इस सब को रोका जाए :

भारत सरकार ने चीन के आयात पर बहुत सारे कर और एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाकर और कुछ चीज़ों पर प्रतिबन्ध लगाकर रोकने का प्रयास किया है परन्तु यह तब तक नाकाफी है जब तक की भारतीय जनमानस चीन के उद्पादों का बहिष्कार करने की ठान न ले। 

यह तभी होगा जब हम लोकल में बने सामान खरीदेंगे।  कुछ दिन परेशानी अवश्य होगी परन्तु धीरे धीरे ये हमारी आदत का हिस्सा हो जायेगा और चीन पर हमारी निर्भरता कम होगी। 
इसका ये कतई अर्थ नहीं है की आज जो हम चीनी मोबाइल या टीवी का उपयोग कर रहे हैं उसे फेंक दें।  हमेंबीएस इतना करना है की हम जो भी सामान खरीदते हैं उसका यदि कोई भारतीय विकल्प उपलब्ध हो तो उसे खरीदें। 
अगर यह एकबार शुरू कर दिया और सभी लोगों ने इसी दिशा में कदम उठाया तो भारतीय बाज़ार पर जोखिम कम होगा और भारत में नौकरियों की नयी संभावनाओं की शुरुआत हो जायेगी और मेक इन इंडिया मुहीम को भी ताकत मिलेगी।  भारत एक बहुत बड़े आयातक से बहुत बड़ा निर्यातक देश भी बन सकता है। 
इसीलिए मेरा निजी मानना है की हमें चीन में बनी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू कर देना चाहिए। 

शनिवार, 8 अगस्त 2020

राम स्तुति अर्थ सहित (Ram stuti with meaning)

                   अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखते ही ऐसा लग रहा है जैसे हर कोईं राममयी हो गया है। प्रभु श्री राम को हर आम और खास याद कर रहा है। 
                   जय श्री राम के नारे हर गाँव, हर शहर, हर जगह सुनाई दिये। यहाँ तक की विदेशों में भी प्रभु श्री राम के मंदिर निर्माण की खुशियां मनाई गई। 


अब जब प्रभु श्री राम की बात हो तो उनकी स्तुति की बात होनी ही चाहिए। श्री राम स्तुति को बचपन से सुनते और गाते आये हैं, इसीलिए आज मन हुआ उनकी स्तुति को अर्थ सहित लिखने का।

                                                        ।।  श्री राम स्तुति  ।।

 

श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।
नवकंज-लोचन, कंज-मुख , कर-कंज पद कंजारुणं ।।

भावार्थ- हे मेरे मन तू कृपालु (दयालु) श्रीरामचंद्रजी का भजन कर, वे संसार के सभी दुखों और डर को दूर करने वाले हैं, उनके नेत्र नव-विकसित कमल के सामान हैं, मुख-हाथ और चरण भी लाल कमल के सदृश हैं ।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।
भावार्थ- उनके सौन्दर्य की छटा अगणित कामदेवों से बढ़कर है, उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर वर्ण है, पीताम्बर मेघरूप शरीरों में मानों बिजली के सामान चमक रहा है, ऐसे पावन रूप जानकी पति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकन्दनं ।
रघुनंद आनंदकंद कोशलचंद दशरथ-नन्दनं ।।

भावार्थ- हे मेरे मन, दीनों के बन्धु, दानव और दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले, रघुकुल के वंश के, आनंदकंद, कौशल-देश के राजा, दशरथनंदन श्रीराम का भजन कर । 

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषण। 
आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणं ।।
भावार्थ- जिनके मस्तक पर मुकुट, कानों में कुंडल, भाल पर सुन्दर तिलक और प्रत्येक अंग में सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं, जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं, जो धनुष-बाण लिए हुए हैं, जिन्होंने संग्राम में खर-दूषण को जीत लिए है ।
इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं ।
मम ह्रदय-कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ।।
भावार्थ- जो शिव, शेष, और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं का नाश करने वाले हैं; तुलसीदास प्रार्थना करते हैं की वे श्री रघुनाथजी मेरे हृदयकमल में सदा निवास करें।
मन जाहिं राचेउ मिलिहि सो बर सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सील सनेहु जानत रावरो ।।
भावार्थ- जिसे तुमने मन में बसाया है, स्वभाव से ही सुन्दर सांवला वर (श्रीरामचन्द्रजी) तुमको मिलेगा । वह दया का सागर और  सर्वज्ञ है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है ।
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हिय हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ।।
भावार्थ- इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखियाँ ह्रदय में हर्षित हुईं । तुलसीदासजी कहते हैं- भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से लौट चलीं।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषि न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।
भावार्थ- गौरी जी को अनुकूल जानकर सीता जी के ह्रदय में जो अत्यंत प्रसन्नता हुई उसे वर्णित नहीं किया जा सकता । सुन्दर मंगलों के मूल उनके बायें अंग फड़कने लगे। 


सियावर रामचंद्र जी की जय।।

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शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

हमारी सहनशीलता और उनकी दरिंदगी

हम लोग बहुत सहनशील हैं अत्यंत सहनशील। रोज़ अनेकों खबरें पढ़ते हैं जिनमें बच्चों पर हो रहे अत्याचारों की खबरें लगभग रोज़ अखबारों में होती हैं। बच्चों और महिलाओं को मिला दें तो रोज़ अखबारों में 4 से 5 खबरें मिल ही जाएंगी। लेकिन इसका कोई इलाज तो हो। आखिर कैसे रुके ये अत्याचार इसपर कोईं बात तो हो। ये ज़िम्मेदारी सरकार की है, कानून व्यवस्था की है या फिर ये हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व है कि इस प्रकार की घटनाओं को रोका जाए। मेरे ख्याल से ये हम सभी की ज़िम्मेदारी है।
मेरा इशारा है दिल्ली में 12 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी की तरफ। आखिर कब तक हमे निर्भया याद आती रहेगी, कहीं ऐसा तो नहीं कि निर्भया की घटना से हमने कुछ सीखा ही नहीं और उसे ही ऐसी घटनाओं के लिए पोस्टर की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 
कुछ समय पहले तेलंगाना में महिला डॉक्टर के साथ हुई घटना ने झकझोर दिया था, दरिंदों के एनकाउंटर पर लोगों की खुशी इतनी थी की दरिंदों की जड़ में पहुँचना ही भूल गए। 

कभी 1 साल की बच्ची के साथ ऐसी घटना होती है तो अपने मनुष्य होने पर भी शर्म आती है। कोईं कैसे इतना विकृत हो सकता है। इन सबके पीछे एक बड़ा कारण नशा है, नशा भी शराब का नहीं, ड्रग्स का। ड्रग्स की लत और उसके नशे के बाद जो कुछ होता है वो शायद मैं या आप समझ भी न पाएं।
                        ड्रग्स प्रतिबंधित है, सरकार को उससे कोईं टैक्स नहीं मिलता फिर भी धड़ल्ले से लोगों को मिल रही है। अगर राजनीतिक संरक्षण न हो तो इसपर भी लगाम लगाई जा सकती है। पर संरक्षण तो हर जगह है। इसका जीता जागता उदाहरण हाल ही मैं हुआ विकास दुबे एनकाउंटर है। इतने सारे अपराध करने के बाद भी वह खुलकर घूम रहा था। आम आदमी को तो थोड़ी सी गाड़ी टकराने में भी जेल हो जाती है यहाँ तो मर्डर, फिरौती, ज़मीन कब्ज़ा जैसे केसों में भी कुछ नहीं हो पाया था। फिर इन्हीं दबंगों के सहारे ड्रग्स का धंधा भी खूब चलता है।
समाज को जाग्रत होना पड़ेगा, अपनी सहनशीलता को कम करके इस अन्याय को रोकना होगा। अन्यथा हमारी आनेवाली पीढ़ियों को हम कैसा समाज देकर जाएंगे।