शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

हमारी सहनशीलता और उनकी दरिंदगी

हम लोग बहुत सहनशील हैं अत्यंत सहनशील। रोज़ अनेकों खबरें पढ़ते हैं जिनमें बच्चों पर हो रहे अत्याचारों की खबरें लगभग रोज़ अखबारों में होती हैं। बच्चों और महिलाओं को मिला दें तो रोज़ अखबारों में 4 से 5 खबरें मिल ही जाएंगी। लेकिन इसका कोई इलाज तो हो। आखिर कैसे रुके ये अत्याचार इसपर कोईं बात तो हो। ये ज़िम्मेदारी सरकार की है, कानून व्यवस्था की है या फिर ये हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व है कि इस प्रकार की घटनाओं को रोका जाए। मेरे ख्याल से ये हम सभी की ज़िम्मेदारी है।
मेरा इशारा है दिल्ली में 12 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी की तरफ। आखिर कब तक हमे निर्भया याद आती रहेगी, कहीं ऐसा तो नहीं कि निर्भया की घटना से हमने कुछ सीखा ही नहीं और उसे ही ऐसी घटनाओं के लिए पोस्टर की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 
कुछ समय पहले तेलंगाना में महिला डॉक्टर के साथ हुई घटना ने झकझोर दिया था, दरिंदों के एनकाउंटर पर लोगों की खुशी इतनी थी की दरिंदों की जड़ में पहुँचना ही भूल गए। 

कभी 1 साल की बच्ची के साथ ऐसी घटना होती है तो अपने मनुष्य होने पर भी शर्म आती है। कोईं कैसे इतना विकृत हो सकता है। इन सबके पीछे एक बड़ा कारण नशा है, नशा भी शराब का नहीं, ड्रग्स का। ड्रग्स की लत और उसके नशे के बाद जो कुछ होता है वो शायद मैं या आप समझ भी न पाएं।
                        ड्रग्स प्रतिबंधित है, सरकार को उससे कोईं टैक्स नहीं मिलता फिर भी धड़ल्ले से लोगों को मिल रही है। अगर राजनीतिक संरक्षण न हो तो इसपर भी लगाम लगाई जा सकती है। पर संरक्षण तो हर जगह है। इसका जीता जागता उदाहरण हाल ही मैं हुआ विकास दुबे एनकाउंटर है। इतने सारे अपराध करने के बाद भी वह खुलकर घूम रहा था। आम आदमी को तो थोड़ी सी गाड़ी टकराने में भी जेल हो जाती है यहाँ तो मर्डर, फिरौती, ज़मीन कब्ज़ा जैसे केसों में भी कुछ नहीं हो पाया था। फिर इन्हीं दबंगों के सहारे ड्रग्स का धंधा भी खूब चलता है।
समाज को जाग्रत होना पड़ेगा, अपनी सहनशीलता को कम करके इस अन्याय को रोकना होगा। अन्यथा हमारी आनेवाली पीढ़ियों को हम कैसा समाज देकर जाएंगे।

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