शनिवार, 1 नवंबर 2025

मध्यप्रदेश का गठन और सत्ता का रवैया

1 नवम्बर यानी मध्यप्रदेश गठन (स्थापना) दिवस। एक ऐसा दिन जिस दिन भारत का दिल कहे जाने वाले प्रदेश का गठन सन 1956 को हुआ था।

बहुत ही अच्छा और शालीन सा प्रदेश है ये। यहाँ की अधिकतम आबादी गाँवों में बसती है और खेती बाड़ी, पशुपालन जैसी आजीविका पर निर्भर करती है।
आज इसके गठन की खबरें दैनिक भास्कर के ऑनलाइन एप्प पर पढ़ रहा था। जिसकी लिंक यहाँ दे रहा हूँ।


कितने अभागे हैं हम लोग। उस समय जब देश आज़ाद हुआ ही था। न जाने कितने लोगों ने अपने घर वालों के प्राणों को खोया था, और वो आज़ादी मिलने से भी खुश नहीं थे क्योंकि खुशियाँ मनाने के लिए जब परिवार जन ही जीवित न हो तो कैसे खुश हुआ जाए। और हमारे प्रदेश में सत्ता हथियाने का खेल चल रहा था। एक दूसरे को नीचे गिराकर स्वम सत्ता हासिल करना ही लक्ष्य बन गया था। एक मुख्यमंत्री तो पैसे लेकर विधायक के पीछे भाग रहे थे। ये सब क्या है?
जब पूरा देश गरीबी और अंधकार में जी रहा था तब रुपये पैसे से नेता खरीदे जा रहे थे। आज भी यही चला आ रहा है। काश की इन पूर्ववर्ती नेताओं ने अपना ज़मीर नहीं बेचा होता तो आजकल के नेता भी ऐसा करने में शर्म खाते।
आजकल तो एक दल से इस्तीफा दो और अगले दिन दूसरे दल में आ जाओ। कोईं शर्म नहीं, जनता के प्रति कोईं जवाबदेही नहीं।
खैर जो होना होता है वो होता है बहरहाल ये राज्य कर्जे की चपेट में आ गया है और यहाँ के सभी नेताओं से मैं अपील करना चाहता हूँ कि आप सभी मुंशी प्रेमचंद जी द्वारा लिखित गबन का अध्ययन करें। इस प्रदेश को कर्ज से बाहर निकालने का प्रयत्न करें ना कि रेवड़ियाँ बांटकर वोट लेने का संघर्ष।
संघर्ष वही याद रहता है जिसके पीछे कुछ सच्चा पाने की चाहत होती है। 
फिर एक बार सभी को मध्यप्रदेश गठन की शुभकामनाएं।🙏

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

सीहोर के गाँवों का विकास दर्शन - किसानों की खुशहाली😔

कल मैं सीहोर जिले में था, चार-पाँच गाँवों में घूम आया। क्या बताऊँ, इतनी तरक्की हुई है कि शहर वाले भी शर्मा जाएँ। हर ओर खुशहाली ही खुशहाली। किसान न केवल खुश हैं, बल्कि इतने समृद्ध हो गए हैं कि अब उन्हें फसल की चिंता नहीं।

कहते हैं, सरकार ने फसल बीमा और मुआवज़ा इतना दिया है कि गाँवों में नोटों की बाढ़ आ गई है। एक दो-एकड़ वाले किसान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया “मेरी फसल में तो मुश्किल से दस प्रतिशत नुकसान हुआ था, लेकिन सरकार ने पचास प्रतिशत के हिसाब से बीमा दे दिया। जरूरत नहीं थी, फिर भी ले लिया। अब गाँव की सड़क बनवाने के लिए पंचायत को दे दिया।”

मैंने कहा, “वाह! ये तो गांधीजी का ग्राम स्वराज उतर आया धरती पर।”
वो बोले, “अब तो सरकार सोयाबीन भी समर्थन मूल्य पर खरीद रही है, उधर से भी मालामाल होने वाले हैं।”

गाँवों की सड़कें देखीं, बोले, “ये अटल जी की बनाई सड़कें हैं। इतनी मजबूत हैं कि अब मरम्मत करने की जरूरत ही नहीं। गड्ढे पड़ गए हैं तो क्या हुआ, ट्रैक्टर चलने में सुविधा रहती है। चिकनी सड़क पर ट्रैक्टर फिसल जाता है।”

मैंने पूछा, “सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि बीमा मुआवज़ा नहीं मिला, सोयाबीन के भाव गिर गए हैं।”
उन्होंने तुरंत आँखें तरेरीं “अरे वो सब देशद्रोही हैं! व्हाट्सऐप-फेसबुक मत देखा करो, अखबार पढ़ो। सरकार ने 55 में से 13 जिलों को मालामाल कर दिया है।”



मैंने कहा, “पर आपका जिला तो उन 13 में है ही नहीं।”

बोले, “तो क्या हुआ? हमें जरूरत ही नहीं। हम सत्ताधारी पार्टी के लोग हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री हमारा भला सोचते हैं। बीमा तो उन लोगों को देना ही नहीं चाहिए जो सरकार पर सवाल उठाते हैं। ज़रूरत क्या है उन्हें पैसों की? दूध घर का है, किराया नहीं देना, खर्चा क्या है? देश और धर्म बचाओ बाकी पेट्रोल कितना भी महँगा हो, चलता है। हमारी सरकार डबल नहीं, अब ट्रिपल इंजन वाली है। जब ये इंजन दौड़ेगा न, तब देखना विकास कैसे भागेगा।”

मैंने पूछा, “और ये इंजन कब दौड़ेगा?”
बोले, “बस ट्रम्प ने जो टैरिफ लगा रखा है, वो हट जाए, फिर देखना उड़ान!”
फिर जोश से बोले, “नेहरू ने जो 28 प्रतिशत GST लगाया था, हमारी सरकार ने उसे घटाकर 18 कर दिया। कारें सस्ती हो गई हैं।”

मैंने कहा, “पर आपकी सड़कें तो टूटी हैं, कार चलेगी कैसे?”
बोले, “हमारे यहाँ ट्रैक्टर चलते हैं, कार नहीं। चिकनी सड़क की हमें जरूरत नहीं, विकास गड्ढों में ही फले-फूले।”

इतना कहकर उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और बोले 
“आप कुछ ठीक नहीं लग रहे। आपकी विचारधारा फिसल रही है। ध्यान रखिए, देशद्रोहियों के चंगुल से बाहर निकलिए।”

मैंने धीरे से कहा, “पर जो लोग कह रहे थे कि 1135 की सोयाबीन पूरी खराब हो गई थी, उन्हें तो बीमा मिलना चाहिए था…”
वो मुस्कुराए, “सरकार ने थोड़े कहा था 1135 बोने का? मेरी और नेताजी की फसल तो नहीं खराब हुई। इन लोगों के कर्म ही खराब हैं। सरकार को दोष देना आसान है।”

फिर चाय का घूंट भरते हुए बोले,
“आप छोड़िए ये छोटी-मोटी बातें। पेट्रोल जिस भाव में मिले, सोयाबीन जिस भाव में बिके, उसे छोड़ो। देश को विश्वगुरु बनाना है। देशभक्ति में भाव नहीं देखा करते, बस भावनाएँ देखी जाती हैं।”

शनिवार, 26 जुलाई 2025

विजय दिवस : एक स्मृति जो आज भी भीगी हुई हैं

सन 1999 का वह जुलाई का महीना था। देश की सरहदें धधक रही थीं,कारगिल में युद्ध अपने चरम पर था। मैं तब स्कूल में पढ़ता था, कक्षा 6 में। देश की परिस्थितियाँ इतनी तीव्र थीं कि हमारे छोटे से स्कूल के वातावरण में भी एक विशेष हलचल थी। एक दिन, अध्यापकगण ने हमें बताया कि देश के लिए हमारा भी एक छोटा-सा योगदान हो सकता है — हमें घर-घर जाकर समर्पण राशि एकत्र करनी थी, जो प्रधानमंत्री राहत कोष में दी जाएगी। हमें एक-एक स्टील का डब्बा दिया गया, जिसमें लोग दान डाल सकें, और साथ में रसीदें दी गईं, ताकि यह अभियान पूरी तरह पारदर्शी हो। जिस दिन हमें समर्पण राशि एकत्र करने जाना था, उस दिन सुबह से ही बारिश हो रही थी। लेकिन वह बारिश हमारे हौसले को भीगने नहीं दे सकी। हम, कुछ छोटे-छोटे बच्चे, कक्षा 6 के, नंगे पाँव, बारिश में भीगते, गलियों और मोहल्लों में देश के लिए लोगों से सहायता माँगने निकले। हाथ में डब्बा, कंधे पर गीली बस्ता और दिल में एक ही भावना, "हम कुछ कर रहे हैं भारत माता के लिए।" लेकिन यह सफर सिर्फ उत्साह से भरा नहीं था। कुछ घरों से हमें प्रेम और दान मिला, तो कुछ दरवाज़ों पर तिरस्कार का सामना भी करना पड़ा। किसी ने यह कहकर झिड़क दिया कि "बच्चों को क्यों भेजा है, क्या तमाशा है यह!" तो किसी ने यह कहकर इनकार कर दिया कि "हमें भरोसा नहीं, यह पैसा सही जगह जाएगा या नहीं।" पर इन सबके बीच एक घटना ने मेरे बाल मन में देशभक्ति के साथ मानवता की भी एक अमिट छाप छोड़ दी। एक घर से एक आंटी बाहर आईं, उन्होंने हमारी बात सुनी, न केवल समर्पण राशि दी, बल्कि मेरे कंधे पर रखे गीले तौलिये को खींचकर मुझे अपने ही तौलिये से पोंछा। उनका वह ममत्व, वह स्नेह… शायद उस क्षण में मुझे पहली बार एहसास हुआ कि देशभक्ति सिर्फ सैनिकों की नहीं होती वह हर उस इंसान के भीतर होती है जो दूसरों के लिए सोचता है, जो निःस्वार्थ भाव से किसी की मदद करता है। आज जब हम विजय दिवस मनाते हैं, शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं तो मेरे मन में यह स्मृति बार-बार लौटकर आती है। वह दिन, वह बारिश, वह ठिठुरन, वह स्टील का डब्बा, और वह ममतामयी आंटी… ये सब मिलकर मेरे लिए कारगिल युद्ध की एक अलग तस्वीर बनाते हैं एक ऐसी तस्वीर जिसमें बच्चों का समर्पण, लोगों की संवेदनाएँ, और राष्ट्र के प्रति भावनाएँ सब कुछ भीगा हुआ था… लेकिन हौसला बिल्कुल सूखा और अडिग था। जय हिन्द।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

"इंदौर की सड़कों पर बारिश नहीं, बेहोशी बरसती है!"

हर साल की तरह इस साल भी जुलाई आई, बादल गरजे, पानी गिरा और इंदौर की ट्रैफिक व्यवस्था फिर पानी-पानी हो गई। अखबारों की हेडलाइन फिर वही रटी-रटाई पंक्तियाँ लिखने लगीं—‘थोड़ी सी बारिश और शहर की व्यवस्था चरमरा गई’—मानो किसी पुराने टेप को फिर से चला दिया गया हो। अब ये खबर नहीं, रिवाज हो गया है। बारिश होती है, सिग्नल गुल हो जाते हैं। लोग सड़कों पर ऐसे भिड़ जाते हैं जैसे KBC की लाइन में खड़े हों—'पहले मैं, पहले मैं!'
पलासिया हो या गीता भवन, हर चौराहे पर यही हाल। जैसे ही पानी गिरा, वैसे ही ट्रैफिक ठहर गया, लोग अटक गए, एम्बुलेंसें थम गईं और कुछ दोपहिया वीर तो उल्टी दिशा से वीरगति पाने निकल पड़े। मैं अपनी एक्टिवा पर सवार था, और हर मोड़ पर यही नज़ारा—हर कोई जैसे लेन शब्द को किसी विदेशी भाषा का गाली समझता हो। जिस लेन में जगह दिखी, वहीं घुस जाना, फिर दो मिनट में वो लेन भी बंद। और जब ट्रैफिक पुलिस समझाने लगे, तो जनता उन्हें ही कक्षा-एक का छात्र समझकर ज्ञान बांटने लगती है। बेशक, सिस्टम की भी गलती होती है। सिग्नल पुराने हैं, मॉनसून प्लानिंग कागज़ों तक सीमित रहती है। लेकिन ये मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि हमारा ‘सिविक सेंस’ कहीं टॉयलेट में गिर चुका है—और अब फ्लश भी हो चुका है।
मैंने एक बार सोचा, चलो मदद कर दी जाए। एक्टिवा साइड में लगाई, खुद ही जाम सुलझाने लगा। पर जैसे ही दो-तीन 'दिग्गज' मोटरसाइकिल सवार फिर गलत दिशा से आकर मोर्चा संभालने लगे, लगा जैसे मैं कोई पौराणिक कथा में धर्म युद्ध लड़ रहा हूँ। न कोई सुनने वाला, न समझने वाला। सबकी सोच बस इतनी है—‘मैं पहले निकल जाऊँ, बाकी जाएँ भाड़ में।’ यह कोई व्यवस्था का विफल प्रयोग मात्र नहीं, यह आम जनता की जिम्मेदारी से भागती मानसिकता का जिंदा सबूत है।
मेरे मन में एक ख्याल आया—अगर इन सड़कों का ड्रोन से वीडियो बनाकर इन महानुभावों को दिखा दिया जाए, तो शायद इन्हें अपनी ही हरकतें देख शर्म आ जाए। मगर अफसोस, इनकी शर्म भी वाटरप्रूफ होती जा रही है। जब तक हम खुद को ट्रैफिक का राजा समझते रहेंगे और कानून को मज़ाक, तब तक इंदौर की सड़कें इसी तरह कीचड़ में धँसी रहेंगी—सिर्फ बारिश की नहीं, हमारे सोच की।
अब वक्त आ गया है कि हम सिर्फ प्रशासन को कोसने के बजाय आइना अपने चेहरे पर भी रखें। हेलमेट पहनना, लेन में चलना, ट्रैफिक सिग्नल का पालन करना ये सब 'सरकारी सज्जा' नहीं, बल्कि 'नागरिक संस्कृति' है।
इंदौर की सड़कों को ठीक करने से पहले, हमें अपनी सोच का इंजन स्टार्ट करना होगा। नहीं तो बारिश आती रहेगी, जाम लगता रहेगा और हम इसी गड्ढे में फंसे रहेंगे—सिर्फ गाड़ियों के नहीं, सोच के।

शनिवार, 9 जुलाई 2022

विधर्मी आग

हमारा भारत देश अपनी सांस्कृतिक विरासत, सहृदयता, करुणा एवं सर्वधर्म समभाव के लिए विश्व विख्यात है। हमेशा भारत ने शांति मार्ग को चुनते हुए कठिन से कठिन परिस्थितियों से पार पाया है। हमने कभी भी युद्ध मार्ग का अनुसरण या युद्ध की पहल नहीं की। हमने उन सभी विदेशियों जो किसी भी कारणवश हमारे देश आए हैं, उनके मन मस्तिष्क पर एक अमिट छाप छोड़ी है। "जो भारत आया भारत का हो गया"। हमारा दर्शन शास्त्र है ही इतना महान। लेकिन आज का समय कुछ अलग है। आज जब हम 21वीं शताब्दी में हैं, भारत के लोगों ने 'भारत की खोज' करना प्रारंभ कर दिया है। जो बहुत अच्छी बात भी है। लोगों ने ग्रंथों को पढ़ना शुरू किया भारतीय विरासत को जिंदा करने का विचार फिर से लोगों के मन में आया। यह भी इसलिए कि कुछ जगह भारतीयों को इतिहास गलत समझाया गया या बताया गया। लेकिन यह सभी के लिए सही नहीं था। भारत पर वर्षों मुगलों का राज रहा और कई आक्रांताओं और राजाओं ने अपने मन मुताबिक शहरों के नाम बदल दिए यहां तक कि बाजारों के नाम भी। जब आज की पीढ़ी को यह बात समझ आई और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी उन्हें साथ दिखी तो इन नामों को बदलना शुरू हो गया। ऐतिहासिक गलतियों का सुधार कार्य पुनः शुरू हुआ। कई जगहों पर मुस्लिम शासकों के नाम पर रखे शहरों के नाम हिंदी में उनकी संस्कृति के हिसाब से बदले जा रहे हैं। एक तरह से यह बिल्कुल सही लगता है, लेकिन परिवर्तन हर किसी को आसानी से हजम नहीं होता। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब जब जिसकी सता रही उसके हिसाब से देश चला और आगे भी निरंतर ऐसे ही चलता रहेगा। औरंगजेब ने मंदिरों को तुड़वाया और उसकी शक्ति के आगे किसी की ना चली और आज मंदिर फिर से बन रहे हैं। 'यथा राजा तथा प्रजा'। कुछ लोगों को लगा कि हम गलत इतिहास पढ़ रहे हैं इसे बदलने की जरूरत है। लेकिन कुछ लोगों ने नया इतिहास भी बनाने की कोशिश की जो बिलकुल सही नहीं है, और उसी वजह से धार्मिक उन्माद बढ़ने लगा। पहले लोग एक दूसरे के धर्म को अपमानित करते रहे अभी दूसरे के देवी देवताओं का भी अपमान करना शुरू कर दिया। अति तब हुई जब इन बातों का संज्ञान विदेशों विदेशी सरकारों ने भी लिया और भारत सरकार को चिट्ठी लिखकर कुछ करने का आग्रह किया। भारत सरकार भी क्या करे, अभिव्यक्ति की आजादी जो है और लोग इसी आजादी का फायदा उठाते हैं। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी अपनी मर्यादा में रहकर ही आपको मिली है। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में आप इस तरह के बयान बाजी या इस तरह के कर्म नहीं कर सकते जो दूसरों के लिए घातक सिद्ध हो। कुछ दिनों पहले एक महिला फिल्मकार ने माता काली को फिल्म के पोस्टर में सिगरेट पीते हुए बताया और वह मानती हैं की माता काली का यह स्वरूप मेरे लिए बिल्कुल सही है। एक महिला भी धूम्रपान कर सकती है क्योंकि पुरुष करते हैं। यह आपकी अपनी पसंद है इसे जानबूझकर आप सब पर मत थोपिए और कम से कम देवी-देवताओं पर तो नहीं। यह लोग सिर्फ प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं चाहे वह अच्छी तरीके से हो या गलत तरीके से हो और गलत तरीके से प्रसिद्धि बहुत जल्दी मिलती है। लेकिन सस्ती प्रसिद्धि के कारण देश में जो हालात पैदा हो रहे हैं वह काफी खतरनाक है।
एक देश जहां सारे धर्म एक साथ प्रेम भाव से रहते हैं, वहां इन सभी धर्मों के बीच एक विधर्मी आग आ गई है और कड़वाहट लगातार बढ़ती जा रही है। समय रहते यदि इस उन्माद को कम नहीं किया गया तो यह आग जंगल की आग से भी खतरनाक साबित होगी और इसमें क्या-क्या जलेगा और क्या-क्या बचेगा इसका ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसलिए यह हम सभी भारत वासियों का कर्तव्य है कि हम समझे कि हमारा धर्म क्या है और उसका अनुसरण करते समय यह भी ध्यान रखें कि उसमें क्या चीजें सही हैं, क्या चीजें गलत है। आज हर तरफ कट्टरवाद की बातें होती हैं। बहुत से देशों में अल्पसंख्यक समाज कट्टर होता है लेकिन जहां-जहां बहुसंख्यक समाज कट्टर हुआ है वहां प्रलय आता है। इसीलिए हमें इस बात की तैयारी रखनी होगी कि हमारे देश का नाम जो आज तक प्रेम भाव के लिए जाना जाता है वह इसी तरह जाना जाए और यह विधर्मी आग और आगे ना बढ़े। धन्यवाद

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

चार दीवारी के भीतर


हमारे जीवन का लगभग नब्बे फीसदी हिस्सा चार दीवारी के भीतर बीतता है, फिर ये चार दीवारी घर की हों, स्कूल की, ऑफिस की, सिनेमा हॉल या कॉन्फ्रेंस रूम कहीं की भी हो सकती हैं पर हमारे जीवन का अगर कोईं सच्चा साक्षी है तो बस ये चार दीवारी हैं। क्या कुछ नहीं देखा इन दीवारों ने, हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक के हर घटनाक्रम इनके ही सामने घटते हैं।
जन्म और मृत्यु तो इनके लिए बड़ी सामान्य बात है क्योंकि ये दीवारें कुछ अंतराल के बाद इन्हें देखती ही हैं, इन्हें खुशियाँ और दुख दोनों को देखने की आदत सी है। लेकिन इन्हें तकलीफ है उस घुटन से जिसमे न जाने कितने लोग इन चार दीवारों के भीतर कैद होकर घुट रहे हैं, वे लोग जो हमारे साथ रोज़ हंस खेल कर रहते हैं, अंदर ही अंदर कितने टूटे हुए हैं ये बात सिर्फ ये दीवारें जानती हैं। इन दीवारों ने ही सुना है उनका रुदन, छुप छुप कर किया गया क्रंदन भी इनसे नहीं छिपा। इनसे कोईं कुछ नहीं छिपा सकता। लेकिन ये दीवारें बड़ी मौलिक हैं, अपना मूल्य जानती हैं, कोईं समझे या न समझे। इनकी जानी हुई बात ये कभी किसी से नहीं कहती। इसीलिए तो कोईं भी इन चार दीवारी में खुल के कुछ भी कह और कर सकता है।
लोग कहते हैं "दीवारों के कान होते हैं", लेकिन कभी भी दीवारों के मुँह नहीं होते। वो सुनती हैं देखती हैं लेकिन कुछ कहती नहीं। 
कभी कभी लगता है इन दीवारों को ही पूजा जाना चाहिए, क्योंकि ये बिल्कुल ईश्वर की तरह है। सब जानती हैं सबका अच्छा बुरा, किन्तु सब होने देती हैं जैसे कि ये विधि का विधान हो। 
न जाने कितने लोग कितने सारे सपने इनके सामने देखते हैं, न जाने कैसी कैसी दुष्कर योजना भी इनके सामने बनती हैं, कितने जीवन आबाद होते हैं कितने बर्बाद, ये सब देखती हैं। कभी कभी अकेले में ये भी रोती या हँसती होंगी, या सोचती होंगी की ईश्वर ने इंसान क्यों बनाये। 
ये दीवारें ये छतें हमे बचाती हैं बाहरी खतरों से, हम बचते हैं बारिश, धूंप और ठंड से जैसे की बचपन में माँ की गोद में उसकी साड़ी का पल्ला हमें छुपाया करता था, उसी तरह अब इन दीवारों के पीछे हम छुपते हैं। इनके बाहर एक बहुत बड़ी दुनियाँ है जहाँ हम कुछ अलग हैं, बनावटी हैं, लेकिन इन दीवारों के सामने हम बिल्कुल सहज और जैसे अंदर से हैं वैसे ही दिखते हैं, कोईं बनावट नहीं।
हम ईश्वर को जगह जगह ढूंढते रहते हैं, उसका पता पूछते रहते हैं बस अपने ही घर की चार दीवारी पर ध्यान नहीं जाता।
कबीर ने सच ही कहा है -
"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढे वन माही,
ऐसे घट घट राम है, दुनियाँ जानत नाही।"

इन चार दीवारी के भीतर बहुत कुछ होता है जो दुनियाँ से छिपाया जा सकता है लेकिन अपने आप से और परमात्मा से नहीं।
सच दीवारें हमारे जीवन का उतना ज़रूरी हिस्सा है जितना कोईं और नहीं। बस हमें जानने की ज़रूरत है।

शनिवार, 12 मार्च 2022

मैं झुकेगा नहीं (Russia & Ukraine)

भारत में अभी कुछ दिनों से एक ट्रेंड चला हुआ है जिसमें लड़के लोग तरह-तरह के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, और कह रहे हैं "मैं झुकेगा नहीं"।
दरअसल यह फिल्म का डायलॉग है जो इतना प्रसिद्ध हुआ कि छोटे से छोटा व्यक्ति और बड़े से बड़ा सेलिब्रिटी भी इस तरह के वीडियोज़ बनाने लगा। लेकिन मजाक तक तो यह ठीक है, अगर इसे कोई वास्तविक जीवन में लेने लगे तो जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगा और जब सिर्फ अपने जीवन की बात ना हो पूरा देश आप पर निर्भर हो, उस समय इस तरह की बातें गलत महसूस होती है, और यही हो रहा है यूक्रेन के राष्ट्राध्यक्ष जेलेंस्की के साथ। 
रूस ने यूक्रेन पर हमला किया और यूक्रेन को पिछले कुछ महीनों से यह भरोसा था कि उनके साथ सारे यूरोपीय देश और अमेरिका है किसी भी हालात में यह लोग मेरा साथ देंगे। इसलिए वो कहते रहे "मैं झुकेगा नहीं"। और एकतरफ रूस के पुतिन साहेब ने पहले ही कह दिया था "मैं झुकेगा नहीं"।
युद्ध हुआ, एकतरफा हुआ, लेकिन मारे गए दोनों तरफ के लोग। राष्ट्राध्यक्ष झुकने को तैयार नहीं हैं और बहुत से परिवार टूट गए, बिखर गए।
यूक्रेन के साथ कोईं नहीं आया, आपकी लड़ाई कोईं दूसरा कभी नहीं लड़ता, खुद की लड़ाई खुद ही लड़ना पड़ता है। यूक्रेन की हालत रूस के सामने वैसी ही है जैसी बाली के सामने सुग्रीव की थी लेकिन सुग्रीव को प्रभु श्री राम का सहारा मिला, लेकिन यहाँ कोईं सहारा नही है।
थोड़ा सा अगर यूक्रेन राजनीति छोड़कर यूक्रेन की बात मान लेता और यूक्रेन के नागरिक भी अपने राष्ट्राध्यक्ष से कहते की हमें नाटो नहीं चाहिए, हमें शांति चाहिए, तो कितना अच्छा होता।
ये आज़ादी की लड़ाई नहीं है ये पागलपन की लड़ाई है। खैर सबका अपना अपना मानना है।
पर जो कभी नहीं झुका वो एक दिन टूट जाता है।

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

युद्ध का उन्माद और शांति

युद्ध का अंत सदैव शांति से होता है। लेकिन जबतक शांति की बात आती है तबतक बहुत कुछ तबाह हो चुका होता है। न जाने कितने परिवार अनाथ हो जाते हैं न जाने कितने लोग आर्थिक रूप से पूरी तरह कमज़ोर हो जाते हैं और इन सबसे बुरा लोग दाने दाने के लिए मोहताज होकर दम तोड़ते हैं।
दुनियाँ में दो विश्वयुद्ध हुवे जिसमें सिर्फ तबाही ही हुई। उसके बाद दुनियाभर के देशों का यही मानना रहा है कि अब तीसरा विश्वयुद्ध नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो मानवता खतरे में पढ़ जाएगी, सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक तौर पर सभी देश कमज़ोर होंगे। 
                    यूक्रेन हमले की तस्वीर

आज के युग में क्या ज़रूरी है कि युद्ध किया जाए??
जब सभी देशों की अर्थव्यवस्था एक दूसरे पर निर्भर करती है, और आज की स्थिति में जब बहुत से देश परमाणु शक्ति बने हुवे हैं युद्ध निश्चित ही तबाही मचाने वाले होंगे।
अब बात करते हैं रूस और यूक्रेन के युद्ध की, इसे युद्ध कहा ही नहीं जा सकता। ये सोचा समझा हमला है यूक्रेन पर जिससे यूक्रेन खुद को बचाने की कोशिश कर रहा है। कल तक जिन देशों के दम पर यूक्रेन अपने भाषणों में ज़ोरआजमाइश कर रहा था आज वो सभी दूर बैठ तमाशबीन बने हुए हैं और सिर्फ भाषण दे रहे हैं। वो कुछ और कर भी नहीं सकते। उन्हें भी अपने नागरिकों की चिंता है, कोईं भी दूसरा देश अगर यूक्रेन को बचाने जंग में उतरता है तो तृतीय विश्वयुद्ध अवश्यम्भावी होगा जिसके परिणाम भयावह होंगे।
रूस ने जो किया वो गलत है पर अपनी शर्तें मनवाने के लिए वो यही कर सकता था। सिर्फ धमकियों से कोईं बात नहीं मानता। "भय बिन होय न प्रीत" पर क्या इस मंत्र को लेकर निर्दोष लोगों को मारना उचित है। 
सिर्फ सर्वश्रेष्ठ बनने और बने रहने की चेष्ठा दुनियाँ को युद्ध में धकेलती है। हम सब मिलजुलकर इस धरती को सुंदर बनाने की बजाय एक अंधी दौड़ में लगे हैं जिससे क्या हासिल होगा पता नहीं। अब इस हमले के बाद चीन के चेहरे पर खुशी पड़ी जा सकती है, वह भी बहुत जल्द ताइवान पर अपना कब्जा जमा सकता है। यही हाल इज़राइल और फिलिस्तीन का है, कोरिया भी अछूता नहीं, कुछ लोग भारत-पाकिस्तान को भी इसी नज़रिये से देख रहे हैं। 
हमें सोचना होगा कि हम किस और जा रहे हैं। हर तरह के अलगाववाद को समझना होगा। जब तक धरती पर लकीरें खींची हैं दिलों में दूरियाँ रहेंगी। इन दूरियों को कम कर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास होना ही चाहिए।
हम कितना ही कुछ कह लें लेकिन हमें याद रखना होगा कि इतिहास खुद को दोहराता है, और यदि ऐसा हुआ तो आने वाली पीढ़ियाँ हमे माफ नहीं करेगी।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

धर्म और प्रेम का सम्बन्ध (Relation of Dharm & Prem)

धर्म का सीधा संबंध समाज से, प्रकृति से, लोगों से प्रेम करना है, लोगों को समझना है। जहां धर्म है वहां प्रेम है। धर्म अर्थात सच्चाई के रास्ते पर चलना। धर्म को आजकल लोग संप्रदाय समझते हैं, लेकिन संप्रदाय बहुत बाद में बने हैं। जो व्यक्ति सत्य के साथ खड़ा है, वही धर्म के साथ है, और जो सच के साथ नहीं है वह अधर्मी है, और जो व्यक्ति सत्य के साथ खड़ा होगा वही लोगों को प्यार कर सकता है, भावनात्मक रूप से लोगों से जुड़ सकता है उन्हें प्रेम कर सकता है। इसलिए इस दुनिया में प्रेम तभी तक जीवित है जब तक लोग धर्म को अपनाते हैं। 
 "जिस दिन धर्म खत्म हो गया, उस दिन इस दुनिया में प्रेम नहीं होगा।"

शनिवार, 8 जनवरी 2022

मेरी तलाश

मुझे अच्छाई की तलाश है जो मेरे आसपास है या नहीं है पता नहीं, पर ये तलाश तबसे शुरू हुई जबसे मैंने अपने पिता को खोया। 
वो अच्छे थे, बहुत अच्छे। उनमें बहुत अच्छाइयाँ थी जो स्वभावतः थी। कोईं दिखावा नही, कोईं छल नहीं। जो है वो स्वाभाविक है।
मुझे लगता है मैं उनका प्रतिबिंब हूँ। पर प्रतिबिम्ब असल नहीं होता, उसमे सत्व नहीं होता, वो आवरण दिखता है। वैसे भी मुझे स्वयं स्वाभाविक तौर पर उन जैसा नहीं बनना, न हीं कोशिश करना है पर मैं चाहता हूँ, मुझे कोईं और वैसा मिले।
मैं दुखी हूँ कि मेरे आसपास मेरे जानने वाले वैसे नहीं हैं, और मैं स्वयं भी वैसा नहीं जिससे मेरे आसपास वाले खुश हों प्रभावित हों, लेकिन मैं फिर भी यही आशा करता हूँ कि कोईं अच्छा बने अच्छा मिले। हो सकता है और लोग भी यही आस लगाए बैठें हों, कुछ ने तो यही आस मुझसे ही लगाई हो। 
मेरी ये तलाश कभी-कभी बेमानी सी लगती है, एक झूँठ जो कि मैंने अपने मन में बसा रखा है। हर तरफ लोग हैं जो उलझे हुए हैं अपनी रोज़ मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने में। वो भाग रहे हैं, परेशान हैं, फिर भी लगे हुए हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि वो इस सब में परेशान हैं या वो ये सब तब भी कर रहे हैं जब कि उनकी अंतरात्मा इस सबसे खुश नहीं है। वो कुछ और करना चाहती है पर ये लोग, हम लोग, मैं भी एक दबाव में है। दौड़ना मजबूरी सा हो गया है बिना लक्ष्य के।
कोईं ऐसा चाहिए जिस पर आवरण न हो, जिसकी देह उसकी अंतरात्मा का ही रूप हो, पूर्णतया सत्य, शांत और निर्मल। जो अपना जीवन अपने दिल से जी रहा हो, उसे पता हो कि वो क्यों और क्या कर रहा है। कोईं ऐसा जो सबसे प्रेम कर सके, प्रेम भी ऐसा जो बंधन में न रखे, उन्मुक्त छोड़ दे खुद को और दूसरों को भी।
ये कठिन है दुर्लभ है परंतु असम्भव नहीं। पता नहीं ये तलाश कब पूरी होगी। 

रविवार, 2 जनवरी 2022

समय की निरंतरता

समय....... इतना कहा ही और समय आगे बढ़ गया। समय रुकता नहीं बस चलता रहता है, निरन्तर, एक ही प्रवाह में, एक ही गति में, बिना विश्राम लिए। 
समय अकेला ही ऐसा है जो कि सबसे आगे है उससे आगे कोईं नहीं, उसे ना कोईं बदल पाया न कोईं पीछे छोड़ पाया।
समय को किसी से कुछ लेना नहीं, किसी को कुछ देना नहीं। बस चलते रहना है। 
ऐसा लगता है जैसे समय में कोईं भावनाएं ही नहीं, कोईं जन्मा खुशी नहीं, कोईं मरा दुख नहीं... वह बस आगे चलता रहता है।
वो न तो रसपूर्ण है, न नीरस है। उसका कोईं ध्येय भी नहीं, कोईं लक्ष्य नहीं, कोईं चाह या लालसा नहीं, उसे बस एक गति में चलना है और इस कार्य में वह पूरी तरह सक्षम है। वह इस कार्य को किसी लगन से या दिल लगाकर नहीं कर रहा, न ही बिना लगन से कर रहा है, उसे बस चलना है और वो चल रहा है। 
युग बदले, दशक बदले, सदियाँ बदली उसे कोईं फर्क नहीं पढ़ा, वो वृद्ध नहीं हुआ पर इसका अर्थ ये नहीं की वह युवा है।
उसके सामने ब्रह्मांड बना वो बढ़ता रहा, प्रभु श्री राम ने जन्म लिया वो चलता रहा, श्री कृष्ण जन्मे वो थमा नहीं, जीजस क्राइस्ट, बुद्ध, महावीर और कितने ही महानुभाव जन्में उसकी निरंतरता न तो रुकी न ही उसकी कोईं लालसा जन्मी। 
न वो किसी का मित्र है न ही किसी का शत्रु है। उसकी किसी से प्रतिस्पर्धा भी नहीं। 
देश बने, सरकारें बनी, सरकारें गिरी, युद्ध हुवे लेकिन वो निरंतर, निष्कपट, समान वेग से चलता रहा। उसे अपने चलने के कर्म में कोईं आसक्ति नहीं है। 
इसीलिए कहा जाता है "समय बड़ा बलवान"

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

पापा, मैं और श्रीमद्भागवत गीता

आज दिनांक 11 दिसम्बर 2021 को मैंने श्रीमद्भागवत गीता जी का भावार्थ सहित अध्ययन पूर्ण किया, लेकिन ये पूर्णता, अपूर्ण और अध्ययन अधूरा रह गया। समझ नहीं पा रहा हूँ कि जो भागवत गीता में लिखा है वो असल जीवन में आसानी से कैसे मान लूँ।
मैंने भागवत गीता का अध्ययन (भावार्थ सहित) लगभग एक वर्ष पहले शुरु किया था और पापा ने लगभग तीन वर्ष पूर्व। उन्होंने ठान रखा था कि हर श्लोक को तीस बार लिखना है ताकि कंठस्थ हो सके और फिर उसका अर्थ समझना है और हर रोज सिर्फ एक ही श्लोक याद करना है। जब मैंने पढ़ना शुरू किया तबसे हम दोनों रोज गीता जी के श्लोकों एवं जन्म मृत्यु से जुड़े प्रश्नों पर बात किया करते रहे। सितम्बर 2021 में पापा आखिरी अठारहवे अध्याय पर पहुँचे और मैं पंद्रहवे पर। और उनसे मैं कहता रहा कि बहुत जल्द आपको पीछे छोड़ दूँगा।

1 अक्टूबर के दिन पापा ने उनका 18 वे अध्याय का बाइसवां श्लोक याद किया और मैं सोलहवे अध्याय के मध्य में था तब भी मैंने यही कहा कि मैं आपको पीछे छोड़ दूँगा और 2 अक्टूबर के दिन पापा ने इस दुनियां को छोड़ दिया वो अपनी भागवत गीता पूर्ण न कर सके। उस दिन में टूट गया, पापा बहुत आगे निकल गए, मैं बहुत पीछे रह गया। 

एक एक कर गीता जी के श्लोक मुझे याद आते रहे परंतु जो खुद पर बीत रही थी उसमें वो श्लोक भी सहारा न दे पा रहे थे। बार बार " नैनं छिन्दन्ति..... ", " न जायते म्रियते ......", "यद्यदाचरति श्रेष्ठ: ..........", "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च ......" जैसे श्लोक मेरे कानों में गूँज रहे थे लेकिन ये उस घड़ी सहारा देने को काफी न थे।
अभी हमें बहुत अध्ययन साथ साथ करना था, अभी उपनिषद बाकी थे, नई महाभारत भी वैसी ही रखी है। 
आज गीता अध्ययन पूर्ण करने पर भी अधूरापन लग रहा है। 

रविवार, 16 अगस्त 2020

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ - स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेयी (Late Shri Atal Bihari Vajpayee Ji)

आज हमारे देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि है, मैं उन्हें शत शत नमन करता हूँ।
वो आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी अमिट छबि सदैव हमारे मन मस्तिष्क में बनी रहेगी, उनके जैसे बिरले व्यक्ति जीवन में देखने को नहीं मिलते।
मैं उनके बारे में इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि वो प्रधानमंत्री थे या भारत रत्न से सम्मानित हैं, मैं इसलिए उनके लिए लिख रहा हूँ क्योंकि उनसे मुझे प्रेरणा मिलती है, उनके जीवन का मेरे जीवन पर अद्भुत प्रभाव रहा है। 

मैं बचपन से सोचता था की मेरा जन्म आज़ादी के समय क्यों नहीं हुआ जब बहुत सारे महापुरुषों ने इस धरती पर बड़े बड़े कार्यों को सम्पादित किया था ताकि मैं भी उन्हें देख पाता, चाहे फिर वो सुभाष चंद्र बोस हों, महात्मा गाँधी हों, शास्त्री जी, लोकमान्य तिलक जी या और भी महान लोग जिन्होंने कठिन परिस्थिति में ऐसे कार्यों को किया जो असंभव से लगते हैं।
मेरा मानना था की महापुरुष पहले हुआ करते थे अब नहीं, लेकिन अटल जी को देखने के बाद मेरा यह भ्रम दूर हुआ। उनको सुनने की लालसा सदैव रहती है। एक सरल और मृदु भाषी व्यक्ति जिन्हें सुनने के लिए सदैव सब लोग तैयार रहा करते थे।
१५ अगस्त का उनका भाषण सुनने के लिए सुबह से टीवी के सामने बैठ जाया करते थे। उनकी कवितायें आज भी नयी सी लगती हैं।
उनका जीवन दर्शन उनकी कविताओं से झलकता है उनकी कविताओं में देश भक्ति की भावना, संघर्ष से सदैव लड़ने की चेष्टा दिखाई देती हैं।

उनकी एक कविता की पंक्तियों में जिस तरह उन्होंने भारत भूमि के लिए लिखा है वो अमर बन गया है 

यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

उनकी कविताओं से ऐसा परिलक्षित होता है, जैसे उनका मन सदैव भारत भूमि के लिए विमर्शरत रहता हो।
उनकी इन पंक्तियों में यह भाव साफ़ देखा जा सकता है :

"जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध,
काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।"

 और देश की सम्प्रभुता को लेकर इस तरह के दृढ निश्चय को उनकी पंक्तियों में देखा जा सकता है की हर तरह के  कठिन संघर्ष के समय भी वह खुद को सकारात्मक रखते थे

"दिन दूर नहीं खंडित भारत को, पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक,  आज़ादी पर्व मनाएँगे॥"

इन पंक्तियों में भी उनकी संघर्ष गाथा और सकारात्मक दृष्टि दिखती है -
"हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ"

और उनकी एक प्रसिद्द कविता जनमानस को आज भी प्रेरणा देती है -

"आओ फिर से दिया जलाएँ, भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा, अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ, आओ फिर से दिया जलाए।

वो देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करके हर तरह बलिदान देकर के लड़ने को तत्पर हैं लेकिन झुकने को तैयार नहीं -

दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

दुश्मन को सीधे आँख दिखाकर बोलने वाला प्रधानमंत्री हमारे देश ने पहली बार देखा था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे एक आम आदमी की तरह ही रहे। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना करते हुवे लिखा था की-

"मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ, 
इतनी रुखाई कभी मत देना।"

परम श्रद्धेय अटल जी के हृदय में देश के लिए अपना बलिदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था।  वे अपनी कविताओं में उन्हें याद करते थे और आज की पीढ़ी से भी बलिदान की अपेक्षा करते थे -

"बलिदानों की बेला आई, लोकतंत्र दे रहा दुहाई,
स्वाभिमान से वही जियेगा, जिससे कीमत गई चुकाई। "

मेरी समझ से अटल जी हमारे देश के पहले ऐसे राजनेता या प्रधानमंत्री रहे हैं, जो अपना धर्म खुलकर स्वीकारते 
थे। धर्मनिरपेक्ष होने के साथ साथ वह गर्व से कहते थे मैं हिन्दू हूँ। धर्मनिरपेक्षता का झूठा दिखावा नहीं किया 
लेकिन कार्य उन्होंने सभी धर्मों के लिए बराबर किया-

"मैं तो समाज की थाती हूं, मैं तो समाज का हूं सेवक।
मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय। "

कितनी भी मुश्किलों का सामना हो अटल जी पुरे निश्चय के साथ उनका डंटकर मुकाबला करते थे उन्होंने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में ही गुजरात भूकंप, गोधरा काण्ड, बाढ़, कारगिल युद्ध और न जाने कितनी कठिनाईयां देखी लेकिन फिर भी देश को मायूस न किया।
उनका मानना था की यदि हम मिलकर लड़ें तो हर तरह की जीत संभव है फिर कितनी ही मुश्किलें क्यों न हों -

"बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।"

अटल जी का जीवन हमारे मन मस्तिष्क पर एक अद्भुत प्रभाव छोड़ता है।  आज भी उन्हें सुनने को मन तरसता है उनके वीडियो यू ट्यूब पर आज भी बड़ी मात्रा में देखे जाते हैं।
मैं धन्य हूँ की मेरे जीवनकाल में एक ऐसे महापुरुष भी रहे, अटल जी को उनकी द्वितीय पुण्यतिथि पर शत शत नमन।