शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

"इंदौर की सड़कों पर बारिश नहीं, बेहोशी बरसती है!"

हर साल की तरह इस साल भी जुलाई आई, बादल गरजे, पानी गिरा और इंदौर की ट्रैफिक व्यवस्था फिर पानी-पानी हो गई। अखबारों की हेडलाइन फिर वही रटी-रटाई पंक्तियाँ लिखने लगीं—‘थोड़ी सी बारिश और शहर की व्यवस्था चरमरा गई’—मानो किसी पुराने टेप को फिर से चला दिया गया हो। अब ये खबर नहीं, रिवाज हो गया है। बारिश होती है, सिग्नल गुल हो जाते हैं। लोग सड़कों पर ऐसे भिड़ जाते हैं जैसे KBC की लाइन में खड़े हों—'पहले मैं, पहले मैं!'
पलासिया हो या गीता भवन, हर चौराहे पर यही हाल। जैसे ही पानी गिरा, वैसे ही ट्रैफिक ठहर गया, लोग अटक गए, एम्बुलेंसें थम गईं और कुछ दोपहिया वीर तो उल्टी दिशा से वीरगति पाने निकल पड़े। मैं अपनी एक्टिवा पर सवार था, और हर मोड़ पर यही नज़ारा—हर कोई जैसे लेन शब्द को किसी विदेशी भाषा का गाली समझता हो। जिस लेन में जगह दिखी, वहीं घुस जाना, फिर दो मिनट में वो लेन भी बंद। और जब ट्रैफिक पुलिस समझाने लगे, तो जनता उन्हें ही कक्षा-एक का छात्र समझकर ज्ञान बांटने लगती है। बेशक, सिस्टम की भी गलती होती है। सिग्नल पुराने हैं, मॉनसून प्लानिंग कागज़ों तक सीमित रहती है। लेकिन ये मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि हमारा ‘सिविक सेंस’ कहीं टॉयलेट में गिर चुका है—और अब फ्लश भी हो चुका है।
मैंने एक बार सोचा, चलो मदद कर दी जाए। एक्टिवा साइड में लगाई, खुद ही जाम सुलझाने लगा। पर जैसे ही दो-तीन 'दिग्गज' मोटरसाइकिल सवार फिर गलत दिशा से आकर मोर्चा संभालने लगे, लगा जैसे मैं कोई पौराणिक कथा में धर्म युद्ध लड़ रहा हूँ। न कोई सुनने वाला, न समझने वाला। सबकी सोच बस इतनी है—‘मैं पहले निकल जाऊँ, बाकी जाएँ भाड़ में।’ यह कोई व्यवस्था का विफल प्रयोग मात्र नहीं, यह आम जनता की जिम्मेदारी से भागती मानसिकता का जिंदा सबूत है।
मेरे मन में एक ख्याल आया—अगर इन सड़कों का ड्रोन से वीडियो बनाकर इन महानुभावों को दिखा दिया जाए, तो शायद इन्हें अपनी ही हरकतें देख शर्म आ जाए। मगर अफसोस, इनकी शर्म भी वाटरप्रूफ होती जा रही है। जब तक हम खुद को ट्रैफिक का राजा समझते रहेंगे और कानून को मज़ाक, तब तक इंदौर की सड़कें इसी तरह कीचड़ में धँसी रहेंगी—सिर्फ बारिश की नहीं, हमारे सोच की।
अब वक्त आ गया है कि हम सिर्फ प्रशासन को कोसने के बजाय आइना अपने चेहरे पर भी रखें। हेलमेट पहनना, लेन में चलना, ट्रैफिक सिग्नल का पालन करना ये सब 'सरकारी सज्जा' नहीं, बल्कि 'नागरिक संस्कृति' है।
इंदौर की सड़कों को ठीक करने से पहले, हमें अपनी सोच का इंजन स्टार्ट करना होगा। नहीं तो बारिश आती रहेगी, जाम लगता रहेगा और हम इसी गड्ढे में फंसे रहेंगे—सिर्फ गाड़ियों के नहीं, सोच के।

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