शनिवार, 26 जुलाई 2025

विजय दिवस : एक स्मृति जो आज भी भीगी हुई हैं

सन 1999 का वह जुलाई का महीना था। देश की सरहदें धधक रही थीं,कारगिल में युद्ध अपने चरम पर था। मैं तब स्कूल में पढ़ता था, कक्षा 6 में। देश की परिस्थितियाँ इतनी तीव्र थीं कि हमारे छोटे से स्कूल के वातावरण में भी एक विशेष हलचल थी। एक दिन, अध्यापकगण ने हमें बताया कि देश के लिए हमारा भी एक छोटा-सा योगदान हो सकता है — हमें घर-घर जाकर समर्पण राशि एकत्र करनी थी, जो प्रधानमंत्री राहत कोष में दी जाएगी। हमें एक-एक स्टील का डब्बा दिया गया, जिसमें लोग दान डाल सकें, और साथ में रसीदें दी गईं, ताकि यह अभियान पूरी तरह पारदर्शी हो। जिस दिन हमें समर्पण राशि एकत्र करने जाना था, उस दिन सुबह से ही बारिश हो रही थी। लेकिन वह बारिश हमारे हौसले को भीगने नहीं दे सकी। हम, कुछ छोटे-छोटे बच्चे, कक्षा 6 के, नंगे पाँव, बारिश में भीगते, गलियों और मोहल्लों में देश के लिए लोगों से सहायता माँगने निकले। हाथ में डब्बा, कंधे पर गीली बस्ता और दिल में एक ही भावना, "हम कुछ कर रहे हैं भारत माता के लिए।" लेकिन यह सफर सिर्फ उत्साह से भरा नहीं था। कुछ घरों से हमें प्रेम और दान मिला, तो कुछ दरवाज़ों पर तिरस्कार का सामना भी करना पड़ा। किसी ने यह कहकर झिड़क दिया कि "बच्चों को क्यों भेजा है, क्या तमाशा है यह!" तो किसी ने यह कहकर इनकार कर दिया कि "हमें भरोसा नहीं, यह पैसा सही जगह जाएगा या नहीं।" पर इन सबके बीच एक घटना ने मेरे बाल मन में देशभक्ति के साथ मानवता की भी एक अमिट छाप छोड़ दी। एक घर से एक आंटी बाहर आईं, उन्होंने हमारी बात सुनी, न केवल समर्पण राशि दी, बल्कि मेरे कंधे पर रखे गीले तौलिये को खींचकर मुझे अपने ही तौलिये से पोंछा। उनका वह ममत्व, वह स्नेह… शायद उस क्षण में मुझे पहली बार एहसास हुआ कि देशभक्ति सिर्फ सैनिकों की नहीं होती वह हर उस इंसान के भीतर होती है जो दूसरों के लिए सोचता है, जो निःस्वार्थ भाव से किसी की मदद करता है। आज जब हम विजय दिवस मनाते हैं, शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं तो मेरे मन में यह स्मृति बार-बार लौटकर आती है। वह दिन, वह बारिश, वह ठिठुरन, वह स्टील का डब्बा, और वह ममतामयी आंटी… ये सब मिलकर मेरे लिए कारगिल युद्ध की एक अलग तस्वीर बनाते हैं एक ऐसी तस्वीर जिसमें बच्चों का समर्पण, लोगों की संवेदनाएँ, और राष्ट्र के प्रति भावनाएँ सब कुछ भीगा हुआ था… लेकिन हौसला बिल्कुल सूखा और अडिग था। जय हिन्द।

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