कल मैं सीहोर जिले में था, चार-पाँच गाँवों में घूम आया। क्या बताऊँ, इतनी तरक्की हुई है कि शहर वाले भी शर्मा जाएँ। हर ओर खुशहाली ही खुशहाली। किसान न केवल खुश हैं, बल्कि इतने समृद्ध हो गए हैं कि अब उन्हें फसल की चिंता नहीं।
कहते हैं, सरकार ने फसल बीमा और मुआवज़ा इतना दिया है कि गाँवों में नोटों की बाढ़ आ गई है। एक दो-एकड़ वाले किसान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया “मेरी फसल में तो मुश्किल से दस प्रतिशत नुकसान हुआ था, लेकिन सरकार ने पचास प्रतिशत के हिसाब से बीमा दे दिया। जरूरत नहीं थी, फिर भी ले लिया। अब गाँव की सड़क बनवाने के लिए पंचायत को दे दिया।”
मैंने कहा, “वाह! ये तो गांधीजी का ग्राम स्वराज उतर आया धरती पर।”
वो बोले, “अब तो सरकार सोयाबीन भी समर्थन मूल्य पर खरीद रही है, उधर से भी मालामाल होने वाले हैं।”
गाँवों की सड़कें देखीं, बोले, “ये अटल जी की बनाई सड़कें हैं। इतनी मजबूत हैं कि अब मरम्मत करने की जरूरत ही नहीं। गड्ढे पड़ गए हैं तो क्या हुआ, ट्रैक्टर चलने में सुविधा रहती है। चिकनी सड़क पर ट्रैक्टर फिसल जाता है।”
मैंने पूछा, “सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि बीमा मुआवज़ा नहीं मिला, सोयाबीन के भाव गिर गए हैं।”
उन्होंने तुरंत आँखें तरेरीं “अरे वो सब देशद्रोही हैं! व्हाट्सऐप-फेसबुक मत देखा करो, अखबार पढ़ो। सरकार ने 55 में से 13 जिलों को मालामाल कर दिया है।”
मैंने कहा, “पर आपका जिला तो उन 13 में है ही नहीं।”
बोले, “तो क्या हुआ? हमें जरूरत ही नहीं। हम सत्ताधारी पार्टी के लोग हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री हमारा भला सोचते हैं। बीमा तो उन लोगों को देना ही नहीं चाहिए जो सरकार पर सवाल उठाते हैं। ज़रूरत क्या है उन्हें पैसों की? दूध घर का है, किराया नहीं देना, खर्चा क्या है? देश और धर्म बचाओ बाकी पेट्रोल कितना भी महँगा हो, चलता है। हमारी सरकार डबल नहीं, अब ट्रिपल इंजन वाली है। जब ये इंजन दौड़ेगा न, तब देखना विकास कैसे भागेगा।”
मैंने पूछा, “और ये इंजन कब दौड़ेगा?”
बोले, “बस ट्रम्प ने जो टैरिफ लगा रखा है, वो हट जाए, फिर देखना उड़ान!”
फिर जोश से बोले, “नेहरू ने जो 28 प्रतिशत GST लगाया था, हमारी सरकार ने उसे घटाकर 18 कर दिया। कारें सस्ती हो गई हैं।”
मैंने कहा, “पर आपकी सड़कें तो टूटी हैं, कार चलेगी कैसे?”
बोले, “हमारे यहाँ ट्रैक्टर चलते हैं, कार नहीं। चिकनी सड़क की हमें जरूरत नहीं, विकास गड्ढों में ही फले-फूले।”
इतना कहकर उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और बोले
“आप कुछ ठीक नहीं लग रहे। आपकी विचारधारा फिसल रही है। ध्यान रखिए, देशद्रोहियों के चंगुल से बाहर निकलिए।”
मैंने धीरे से कहा, “पर जो लोग कह रहे थे कि 1135 की सोयाबीन पूरी खराब हो गई थी, उन्हें तो बीमा मिलना चाहिए था…”
वो मुस्कुराए, “सरकार ने थोड़े कहा था 1135 बोने का? मेरी और नेताजी की फसल तो नहीं खराब हुई। इन लोगों के कर्म ही खराब हैं। सरकार को दोष देना आसान है।”
फिर चाय का घूंट भरते हुए बोले,
“आप छोड़िए ये छोटी-मोटी बातें। पेट्रोल जिस भाव में मिले, सोयाबीन जिस भाव में बिके, उसे छोड़ो। देश को विश्वगुरु बनाना है। देशभक्ति में भाव नहीं देखा करते, बस भावनाएँ देखी जाती हैं।”