शनिवार, 11 दिसंबर 2021

पापा, मैं और श्रीमद्भागवत गीता

आज दिनांक 11 दिसम्बर 2021 को मैंने श्रीमद्भागवत गीता जी का भावार्थ सहित अध्ययन पूर्ण किया, लेकिन ये पूर्णता, अपूर्ण और अध्ययन अधूरा रह गया। समझ नहीं पा रहा हूँ कि जो भागवत गीता में लिखा है वो असल जीवन में आसानी से कैसे मान लूँ।
मैंने भागवत गीता का अध्ययन (भावार्थ सहित) लगभग एक वर्ष पहले शुरु किया था और पापा ने लगभग तीन वर्ष पूर्व। उन्होंने ठान रखा था कि हर श्लोक को तीस बार लिखना है ताकि कंठस्थ हो सके और फिर उसका अर्थ समझना है और हर रोज सिर्फ एक ही श्लोक याद करना है। जब मैंने पढ़ना शुरू किया तबसे हम दोनों रोज गीता जी के श्लोकों एवं जन्म मृत्यु से जुड़े प्रश्नों पर बात किया करते रहे। सितम्बर 2021 में पापा आखिरी अठारहवे अध्याय पर पहुँचे और मैं पंद्रहवे पर। और उनसे मैं कहता रहा कि बहुत जल्द आपको पीछे छोड़ दूँगा।

1 अक्टूबर के दिन पापा ने उनका 18 वे अध्याय का बाइसवां श्लोक याद किया और मैं सोलहवे अध्याय के मध्य में था तब भी मैंने यही कहा कि मैं आपको पीछे छोड़ दूँगा और 2 अक्टूबर के दिन पापा ने इस दुनियां को छोड़ दिया वो अपनी भागवत गीता पूर्ण न कर सके। उस दिन में टूट गया, पापा बहुत आगे निकल गए, मैं बहुत पीछे रह गया। 

एक एक कर गीता जी के श्लोक मुझे याद आते रहे परंतु जो खुद पर बीत रही थी उसमें वो श्लोक भी सहारा न दे पा रहे थे। बार बार " नैनं छिन्दन्ति..... ", " न जायते म्रियते ......", "यद्यदाचरति श्रेष्ठ: ..........", "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च ......" जैसे श्लोक मेरे कानों में गूँज रहे थे लेकिन ये उस घड़ी सहारा देने को काफी न थे।
अभी हमें बहुत अध्ययन साथ साथ करना था, अभी उपनिषद बाकी थे, नई महाभारत भी वैसी ही रखी है। 
आज गीता अध्ययन पूर्ण करने पर भी अधूरापन लग रहा है। 

1 टिप्पणी:

Rahul Kumar karmodia ने कहा…

18 वें अध्याय पर पहुंचकर उन्होंने मोक्ष पा लिया
भाई यह पहली बार पता चला की मामा
भगवद गीता पर इतनी गंभीरता से कार्य
कर रहे थे। मामा ने अपना जीवन राजा
की तरह जिया और साधु की तरह चुपचाप सबकुछ
छोड़कर चले गए। मुझे भी शिव सूत्र सुनने के लिए
भेजा था। मामा आपकी जगह का यह खालीपन
असहनीय है।