दुनियाँ में दो विश्वयुद्ध हुवे जिसमें सिर्फ तबाही ही हुई। उसके बाद दुनियाभर के देशों का यही मानना रहा है कि अब तीसरा विश्वयुद्ध नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो मानवता खतरे में पढ़ जाएगी, सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक तौर पर सभी देश कमज़ोर होंगे।
जब सभी देशों की अर्थव्यवस्था एक दूसरे पर निर्भर करती है, और आज की स्थिति में जब बहुत से देश परमाणु शक्ति बने हुवे हैं युद्ध निश्चित ही तबाही मचाने वाले होंगे।
अब बात करते हैं रूस और यूक्रेन के युद्ध की, इसे युद्ध कहा ही नहीं जा सकता। ये सोचा समझा हमला है यूक्रेन पर जिससे यूक्रेन खुद को बचाने की कोशिश कर रहा है। कल तक जिन देशों के दम पर यूक्रेन अपने भाषणों में ज़ोरआजमाइश कर रहा था आज वो सभी दूर बैठ तमाशबीन बने हुए हैं और सिर्फ भाषण दे रहे हैं। वो कुछ और कर भी नहीं सकते। उन्हें भी अपने नागरिकों की चिंता है, कोईं भी दूसरा देश अगर यूक्रेन को बचाने जंग में उतरता है तो तृतीय विश्वयुद्ध अवश्यम्भावी होगा जिसके परिणाम भयावह होंगे।
रूस ने जो किया वो गलत है पर अपनी शर्तें मनवाने के लिए वो यही कर सकता था। सिर्फ धमकियों से कोईं बात नहीं मानता। "भय बिन होय न प्रीत" पर क्या इस मंत्र को लेकर निर्दोष लोगों को मारना उचित है।
सिर्फ सर्वश्रेष्ठ बनने और बने रहने की चेष्ठा दुनियाँ को युद्ध में धकेलती है। हम सब मिलजुलकर इस धरती को सुंदर बनाने की बजाय एक अंधी दौड़ में लगे हैं जिससे क्या हासिल होगा पता नहीं। अब इस हमले के बाद चीन के चेहरे पर खुशी पड़ी जा सकती है, वह भी बहुत जल्द ताइवान पर अपना कब्जा जमा सकता है। यही हाल इज़राइल और फिलिस्तीन का है, कोरिया भी अछूता नहीं, कुछ लोग भारत-पाकिस्तान को भी इसी नज़रिये से देख रहे हैं।
हमें सोचना होगा कि हम किस और जा रहे हैं। हर तरह के अलगाववाद को समझना होगा। जब तक धरती पर लकीरें खींची हैं दिलों में दूरियाँ रहेंगी। इन दूरियों को कम कर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास होना ही चाहिए।
हम कितना ही कुछ कह लें लेकिन हमें याद रखना होगा कि इतिहास खुद को दोहराता है, और यदि ऐसा हुआ तो आने वाली पीढ़ियाँ हमे माफ नहीं करेगी।
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