शनिवार, 8 अगस्त 2020

राम स्तुति अर्थ सहित (Ram stuti with meaning)

                   अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखते ही ऐसा लग रहा है जैसे हर कोईं राममयी हो गया है। प्रभु श्री राम को हर आम और खास याद कर रहा है। 
                   जय श्री राम के नारे हर गाँव, हर शहर, हर जगह सुनाई दिये। यहाँ तक की विदेशों में भी प्रभु श्री राम के मंदिर निर्माण की खुशियां मनाई गई। 


अब जब प्रभु श्री राम की बात हो तो उनकी स्तुति की बात होनी ही चाहिए। श्री राम स्तुति को बचपन से सुनते और गाते आये हैं, इसीलिए आज मन हुआ उनकी स्तुति को अर्थ सहित लिखने का।

                                                        ।।  श्री राम स्तुति  ।।

 

श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।
नवकंज-लोचन, कंज-मुख , कर-कंज पद कंजारुणं ।।

भावार्थ- हे मेरे मन तू कृपालु (दयालु) श्रीरामचंद्रजी का भजन कर, वे संसार के सभी दुखों और डर को दूर करने वाले हैं, उनके नेत्र नव-विकसित कमल के सामान हैं, मुख-हाथ और चरण भी लाल कमल के सदृश हैं ।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।
भावार्थ- उनके सौन्दर्य की छटा अगणित कामदेवों से बढ़कर है, उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर वर्ण है, पीताम्बर मेघरूप शरीरों में मानों बिजली के सामान चमक रहा है, ऐसे पावन रूप जानकी पति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकन्दनं ।
रघुनंद आनंदकंद कोशलचंद दशरथ-नन्दनं ।।

भावार्थ- हे मेरे मन, दीनों के बन्धु, दानव और दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले, रघुकुल के वंश के, आनंदकंद, कौशल-देश के राजा, दशरथनंदन श्रीराम का भजन कर । 

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषण। 
आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणं ।।
भावार्थ- जिनके मस्तक पर मुकुट, कानों में कुंडल, भाल पर सुन्दर तिलक और प्रत्येक अंग में सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं, जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं, जो धनुष-बाण लिए हुए हैं, जिन्होंने संग्राम में खर-दूषण को जीत लिए है ।
इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं ।
मम ह्रदय-कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ।।
भावार्थ- जो शिव, शेष, और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं का नाश करने वाले हैं; तुलसीदास प्रार्थना करते हैं की वे श्री रघुनाथजी मेरे हृदयकमल में सदा निवास करें।
मन जाहिं राचेउ मिलिहि सो बर सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सील सनेहु जानत रावरो ।।
भावार्थ- जिसे तुमने मन में बसाया है, स्वभाव से ही सुन्दर सांवला वर (श्रीरामचन्द्रजी) तुमको मिलेगा । वह दया का सागर और  सर्वज्ञ है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है ।
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हिय हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ।।
भावार्थ- इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखियाँ ह्रदय में हर्षित हुईं । तुलसीदासजी कहते हैं- भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से लौट चलीं।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषि न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।
भावार्थ- गौरी जी को अनुकूल जानकर सीता जी के ह्रदय में जो अत्यंत प्रसन्नता हुई उसे वर्णित नहीं किया जा सकता । सुन्दर मंगलों के मूल उनके बायें अंग फड़कने लगे। 


सियावर रामचंद्र जी की जय।।

_______________________________________________






कोई टिप्पणी नहीं: