सोमवार, 10 अगस्त 2020

चीनी उद्पादों का बहिष्कार (Boycott Chinese products)

                                 इस समय लगभग पुरे देश में चीन विरोधी माहौल बना हुआ है। हमारा देश ही क्या कोरोना महामारी फैलने के बाद तो विश्व के कई देश खुलकर चीन के खिलाफ बोल रहे है। भारत में चीन का विरोध होने के बहुत सारे कारण है, और सबसे बड़ा कारण है राष्ट्र सुरक्षा।

पिछले कई सालों से भारत ने अनुभव किया है की आतंकवाद रोकने के मामले में चीन भारत का समर्थन नहीं करता, चीन का समर्थन करना या विरोध करना उसका अपना आतंरिक मामला है परन्तु उसके गलत निर्णयों की वजह से भारत से आतंकवाद ख़त्म करने में कठिनाइयां आती हैं।  गलवान घाटी वाला मामला अभी ताज़ा ही है जहाँ हमारे जवानों की शहादत चीन की विस्तारवादी सोंच की वजह से हुई।  

यहाँ बात सिर्फ चीन के भारतीय सीमाओं पर कब्ज़ा करने की नहीं है।  चीन भारतीय बाज़ार पर शुरू से ही पूरी तरह कब्ज़ा कर भारतीय बाज़ार को पूरी तरह हथियाना चाहता है और बहुत सारे सेक्टर्स में वह सफल भी हुआ है। 

चीन ने पिछले वर्ष भारत में लगभग ४०० बिलियन डॉलर का निर्यात किया जो की हमारे निर्यात से बहुत ज़्यादा है। चीन की व्यापर नीति के मुताबिक वह भारत के बहुत से सेक्टर्स में सुनियोजित तरीके से निवेश करता है और भारत में बहुत काम कीमत में अपने माल को बेचने के बाद भारतीय मूल के उद्योगों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाता है। 

कईं बार देखा गया है की चीन से सस्ते माल के आयात की वजह से भारत के कईं उद्योगों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है और कइयों को तो बंद ही करना पड़ा है। 

इसका सबसे बड़ा उदहारण है खिलौना उद्योग, जबसे भारत में चीनी खिलौनों ने पैर पसारना शुरू किया है भारत के कईं सारे खिलौना उद्योगों को बंद होना पड़ा है और उनसे जुड़े रोज़गारों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। 

ऐसा ही एक उदाहरण है सोर ऊर्जा सेक्टर (सोलर एनर्जी) जिसमें भारत ने बहुत प्रगति की लेकिन चीन से सस्ते सोलर पेनल के आयात की वजह से भारत उतने रोज़गार पैदा नहीं कर पाया जितने उसने सोचा था और तो और आयात की वजह से रिसर्च पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। 

जब हम कोई प्रोडक्ट खुद बनाते हैं तो उसपर लगातार रिसर्च करते हैं की कैसे उसे और उपयोगी, कुशल और सस्ता बना सकें लेकिन जब वही चीज़ हम काम कीमत में आयात करते हैं तो उसपर रिसर्च लगभग बंद हो जाती है। इसलिए विज्ञानं के क्षेत्र में बहुत नुकसान होता है इस तरह के आयात के कारण। 

ये दो सिर्फ बहुत छोटे उदहारण हैं , चीन ने लगभग हर सेक्टर पर आज अपना कब्ज़ा किया हुआ है।  चीन के सस्ते मोबाइल की वजह से भारत में बड़े उद्योगपति यहाँ मोबाइल कंपनी डालने तक में डरते हैं, ऐसा ही हाल टेलीविज़न बनाने वालों का हुआ।  चीन का एल ई डी मार्केट इतना सक्षम है की भारतीय टेलीविज़न और डेकोरेशन वाले उद्योगपति उसके सामने बुरी तरह लड़खड़ा गए। 

कैसे इस सब को रोका जाए :

भारत सरकार ने चीन के आयात पर बहुत सारे कर और एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाकर और कुछ चीज़ों पर प्रतिबन्ध लगाकर रोकने का प्रयास किया है परन्तु यह तब तक नाकाफी है जब तक की भारतीय जनमानस चीन के उद्पादों का बहिष्कार करने की ठान न ले। 

यह तभी होगा जब हम लोकल में बने सामान खरीदेंगे।  कुछ दिन परेशानी अवश्य होगी परन्तु धीरे धीरे ये हमारी आदत का हिस्सा हो जायेगा और चीन पर हमारी निर्भरता कम होगी। 
इसका ये कतई अर्थ नहीं है की आज जो हम चीनी मोबाइल या टीवी का उपयोग कर रहे हैं उसे फेंक दें।  हमेंबीएस इतना करना है की हम जो भी सामान खरीदते हैं उसका यदि कोई भारतीय विकल्प उपलब्ध हो तो उसे खरीदें। 
अगर यह एकबार शुरू कर दिया और सभी लोगों ने इसी दिशा में कदम उठाया तो भारतीय बाज़ार पर जोखिम कम होगा और भारत में नौकरियों की नयी संभावनाओं की शुरुआत हो जायेगी और मेक इन इंडिया मुहीम को भी ताकत मिलेगी।  भारत एक बहुत बड़े आयातक से बहुत बड़ा निर्यातक देश भी बन सकता है। 
इसीलिए मेरा निजी मानना है की हमें चीन में बनी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू कर देना चाहिए। 

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