सोमवार, 25 अप्रैल 2022

चार दीवारी के भीतर


हमारे जीवन का लगभग नब्बे फीसदी हिस्सा चार दीवारी के भीतर बीतता है, फिर ये चार दीवारी घर की हों, स्कूल की, ऑफिस की, सिनेमा हॉल या कॉन्फ्रेंस रूम कहीं की भी हो सकती हैं पर हमारे जीवन का अगर कोईं सच्चा साक्षी है तो बस ये चार दीवारी हैं। क्या कुछ नहीं देखा इन दीवारों ने, हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक के हर घटनाक्रम इनके ही सामने घटते हैं।
जन्म और मृत्यु तो इनके लिए बड़ी सामान्य बात है क्योंकि ये दीवारें कुछ अंतराल के बाद इन्हें देखती ही हैं, इन्हें खुशियाँ और दुख दोनों को देखने की आदत सी है। लेकिन इन्हें तकलीफ है उस घुटन से जिसमे न जाने कितने लोग इन चार दीवारों के भीतर कैद होकर घुट रहे हैं, वे लोग जो हमारे साथ रोज़ हंस खेल कर रहते हैं, अंदर ही अंदर कितने टूटे हुए हैं ये बात सिर्फ ये दीवारें जानती हैं। इन दीवारों ने ही सुना है उनका रुदन, छुप छुप कर किया गया क्रंदन भी इनसे नहीं छिपा। इनसे कोईं कुछ नहीं छिपा सकता। लेकिन ये दीवारें बड़ी मौलिक हैं, अपना मूल्य जानती हैं, कोईं समझे या न समझे। इनकी जानी हुई बात ये कभी किसी से नहीं कहती। इसीलिए तो कोईं भी इन चार दीवारी में खुल के कुछ भी कह और कर सकता है।
लोग कहते हैं "दीवारों के कान होते हैं", लेकिन कभी भी दीवारों के मुँह नहीं होते। वो सुनती हैं देखती हैं लेकिन कुछ कहती नहीं। 
कभी कभी लगता है इन दीवारों को ही पूजा जाना चाहिए, क्योंकि ये बिल्कुल ईश्वर की तरह है। सब जानती हैं सबका अच्छा बुरा, किन्तु सब होने देती हैं जैसे कि ये विधि का विधान हो। 
न जाने कितने लोग कितने सारे सपने इनके सामने देखते हैं, न जाने कैसी कैसी दुष्कर योजना भी इनके सामने बनती हैं, कितने जीवन आबाद होते हैं कितने बर्बाद, ये सब देखती हैं। कभी कभी अकेले में ये भी रोती या हँसती होंगी, या सोचती होंगी की ईश्वर ने इंसान क्यों बनाये। 
ये दीवारें ये छतें हमे बचाती हैं बाहरी खतरों से, हम बचते हैं बारिश, धूंप और ठंड से जैसे की बचपन में माँ की गोद में उसकी साड़ी का पल्ला हमें छुपाया करता था, उसी तरह अब इन दीवारों के पीछे हम छुपते हैं। इनके बाहर एक बहुत बड़ी दुनियाँ है जहाँ हम कुछ अलग हैं, बनावटी हैं, लेकिन इन दीवारों के सामने हम बिल्कुल सहज और जैसे अंदर से हैं वैसे ही दिखते हैं, कोईं बनावट नहीं।
हम ईश्वर को जगह जगह ढूंढते रहते हैं, उसका पता पूछते रहते हैं बस अपने ही घर की चार दीवारी पर ध्यान नहीं जाता।
कबीर ने सच ही कहा है -
"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढे वन माही,
ऐसे घट घट राम है, दुनियाँ जानत नाही।"

इन चार दीवारी के भीतर बहुत कुछ होता है जो दुनियाँ से छिपाया जा सकता है लेकिन अपने आप से और परमात्मा से नहीं।
सच दीवारें हमारे जीवन का उतना ज़रूरी हिस्सा है जितना कोईं और नहीं। बस हमें जानने की ज़रूरत है।

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Sach he bhaiya bahut achcha wishleshan kiya he

Unknown ने कहा…

Niceeeee